TEJASVI ASTITVA
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ISSN NO. 2581-9070 ONLINE

हिन्दी साहित्य में अनुसंधान की भूमिका – डॉ. बी. सुभा

हिन्दी साहित्य में अनुसंधान की भूमिका

डॉ. बी. सुभा

हिन्दी प्राध्यापिका

महाराजा स्वायत्त कलाशाला

विजयनगरम, आंध्र प्रदेश

                      अन्वेषण, मीमांसा, अनुशीलन, परिशीलन, आलोचना, शोध, खोज, गवेषण आदि अनुसंधान के पर्यायवाची माने जाते हैं। किसी समस्या को समाधान की खोज करना अनुसंधान का प्रमुख उद्देश्य है। वह खोज वैज्ञानिक स्तर पर करने से एक योग्य समाधान प्राप्त होता है। अनुसंधान सही दिशा निर्देशन के साथ व्यक्तिगत ज्ञान को विकसित करती है। साहित्य में अनुसंधान के द्वारा नई शैली, रचनात्मक विकास और मानवीय मूल्यों का विकास की गरिमा बढ़ती है। जॉन बेस्ट का विचार है कि सांस्कृतिक उन्नति का रहस्य शोध में निहित है। मानव में निहित यह अनुसंधान प्रवृत्ति के कारण आदिमानव को वैज्ञानिक युग की प्रगति की सफलता संभव हुई। अनुसंधान प्रवृत्ति ने मानव को समय के अनुसार आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। समाज, राष्ट्र, देश या विश्व की प्रगति के लिए अनुसंधान से बढ़कर कोई साधन नहीं के बराबर है।

                  मनुष्य के विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम ही साहित्य है। साहित्य मानव मस्तिष्क को पुष्ठ बनाती है। साहित्य पठन और सृजन से मानव स्वयं को चिंता से दूर कर सकता है। साहित्य का संबंध सभी शास्त्रों से रहता है। साहित्य के बिना कोई भी शास्त्र का अस्तित्व नहीं रहता है। माना जाता है कि ‘’साहित्य समाज का दर्पण है।‘’ (Literature is the mirror of Society) साहित्य रूपी आईने में हम तत्कालीन सामाजिक स्थिति, आचार-विचार, खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा, तौर-तरीके साथ ही आर्थिक और सांस्कृतिक गरिमाओं का सजीव चित्रण उपलब्ध होता है। इस कारण किसी भी व्यक्ति, समाज, राष्ट्र, देश या विश्व की उन्नति उससे संबंधित साहित्य पर निर्भर रहता है।

                       अनुसंधान करने के लिए आवश्यक तथ्य है-समस्या। इस समस्या का समाधान ढूंढने के लिए उससे संबंधित साहित्य का सहारा लेना अनिवार्य है। अनुसंधान कर्ता को विषय से संबंधित साहित्य पढ़ने से समस्या का मूल अवगत होता है। वैश्वीकरण के इस दौर में अनुसंधान का महत्व और भी बढ़ गया है। अनुसंधान कार्य विद्यार्थियोँ और शोधार्थियों को भी अधिक लाभान्वित है। अनुसंधान के लिए नैतिकता की आवश्यकता है। साथ ही अनुसंधान कार्य ईमानदारी से करने पर ही सही लक्ष्य प्राप्त होता है। अनुसंधान कोई आसान काम नहीं है। अनुसंधान के लिए पहले एक समस्या की आवश्यकता होती है। उस समस्या का समाधान ढूंढते हुए आगे बढ़ना है। इसके लिए जिज्ञासा या ज्ञान की जरूरत है। साहित्य एक तरह से ज्ञान का भंडार है। चाहे वैज्ञानिक अनुसंधान हो, भौतिक विज्ञान का हो या सामाजिक विज्ञान का हो उससे संबंधित साहित्य का आद्यंत पठन आवश्यक है। चुने हुए क्षेत्र से संबंधित साहित्यिक पुस्तकें, ज्ञान-कोष, पत्र-पत्रिकाएँ आदि का अध्ययन से अनुसंधान का सच्चा पथ-प्रदर्शन होता है। व्यक्ति चाहे कितना ही ज्ञानवान हो, कितने ही कुशल हो, अभिव्यक्ति का सफल माध्यम तो भाषा है।

                   हिन्दी साहित्य में भी अनुसंधान योग्य कई विधाएँ हैं। हिन्दी साहित्य में अनुसंधान की आवश्यकता को स्पष्ट करते हुए बेस्ट महोदय ने इस प्रकार बताया कि व्यावहारिक दृष्टि से सारा मानव ज्ञान पुस्तकों एवं पुस्तकालयों में प्राप्त किया जाता है। अन्य प्राणियों से भिन्न मानव को अतीत से प्राप्त ज्ञान को प्रत्येक पीढ़ी के साथ नवीन ज्ञान के रूप में प्रारंभ करना चाहिए। मानव समाज अपने प्राचीन अनुभव को संग्रहित एवं सुरक्षित रखता है। ज्ञान के अथाह भंडार में मानव का निरंतर योग सभी क्षेत्रों में उनके विकास का आधार है। साहित्य में अनुसंधान कार्य से अर्जित ज्ञान में विकास होता है। इससे भाषाओं की प्रगति भी संभव है। साहित्य में प्रतिबिंबित सामाजिक संबंधों का अनुसंधान के द्वारा सुव्यवस्थित समाज का निर्माण कर सकते हैं। हिन्दी साहित्य की विधाएँ हैं- काव्य, कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, निबंध, यात्रा-वर्णन, आत्मकथा, रेखा-चित्र, डायरी, पत्र-लेखन आदि किसी क्षेत्र में अनुसंधान करने से ज्ञात होता है कि साहित्य में अनुसंधान कितना आवश्यक है। हिन्दी साहित्य में इन सभी विधाओं का उन्नत स्थान है। हिन्दी कविता का अनुपम स्थान है। हिन्दी साहित्य के आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं के द्वारा तत्कालीन समाज को प्रस्तुत किया। आदिकाल या वीरगाथा काल के प्रमुख कवि चंदबरदाई ने ‘’पृथ्वीराज रासो’’ काव्य में पृथ्वीराज की वीर गाथा का वर्णन के साथ मित्रता को निभाने की आवश्यकता को भी समझाया।

                       भक्तिकाल के ज्ञानाश्रई शाखा के प्रमुख कवि कबीरदास अनपढ़ होते हुए भी साधु-संगति और देशाटन के द्वारा जो ज्ञान का समुपार्जन किया, उस ज्ञान को उपदेशों के रूप में बताकर ज्ञान की आवश्यकता और मानव अपनी ज्ञान की वृद्धि के लिए देशाटन की आवश्यकता को समझाया। देश की उन्नति के लिए तत्कालीन समाज में हिन्दू-मुस्लिम एकता की स्थापना को आवश्यक मानकर युगीन माँग के अनुसार कबीरदास ने कोशिश की। आज वैश्वीकरण का नींव कबीरदास ने अपने समय में ही डाला। उन्होंने “वसुधैव कुटुंबकम” की भावना का समर्थन किया। रामभक्तिशाखा के प्रवर्तक तुलसीदास ने “रामचरितमानस” काव्य में राम कथा के माध्यम से आदर्श समाज, आदर्श पुत्र, आदर्श राजा, आदर्श भाई, आदर्श संस्कृति, आदर्श भाषा की अनिवार्यता को समझाया। साथ ही उन्होंने आदर्श सामाजिक मूल्यों का चित्रण किया। उन्होंने राम के बारे में लिखा-

                                                राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है।

कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है।।

                   कवि सूरदास कृष्णभक्तिशाखा के प्रमुख कवि हैं। वे जन्मांध होते हुए भी कृष्ण की बाल-लीला का सजीव चित्रण किया है। साथ ही सखा-भक्ति का वैशिष्ट्य को साबित किया। रीतिकाल के प्रमुख कवि बिहारी ने 719 दोहों की रचना के द्वारा सतसई परंपरा की नींव डाली। उन्होंने अपने समय के राजा जयसिंह अपना राज-काज को छोड़कर विलासमय जीवन बिताते रह जाने पर स्वयं बिहारीलाल ने एक दोहा लिखकर भेजा –

                                      नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहिकाल।

                                         अली! कली ही सौं बैध्यौ; आगे कौन हवाल।।

                   आधुनिक काल में भारतेन्दु युग के प्रतिनिधि कवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपनी “मातृभाषा के प्रति” कविता में मातृभाषा ज्ञान की अनिवार्यता को समझाया। इस कविता से उन्होंने सारे देशवासियों को मातृभाषा के प्रति आकर्षित करने में सफलता प्राप्त की। उनके अनुसार आदमी कितने ही भाषाओं में विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करने पर भी अपनी मातृभाषा ज्ञान के बिना अधूरा रह जाता है।

निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल ।

बिन निज भाषा-ज्ञान के मिटत न हिय को सूल।।

अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होते प्रवीन।

पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।

                       कवि जयशंकर प्रसाद के नाटक ‘चन्द्रगुप्त’ के लिए लिखा गया गीत ‘हिमाद्रि से’ पर अनुसंधान करने से ज्ञात होता है कि छोटी सी कविता के माध्यम से उन्होंने सारे भारतवासियों में देश भक्ति की भावना को जागृत किया। अपना ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक को और भी रोचक बनाया। परवर्त्ती साहित्यकारों ने अपने नाटकों में आवश्यकता के अनुसार गीत लिखना आरंभ किया। मैथिलीशरण गुप्त जी ने ‘महत्ता’ कविता के द्वारा भारतीय संस्कृति की महानता को उजागर किया। माखनलाल चतुर्वेदी जी ने ‘’पुष्प की अभिलाषा, पर्वत की अभिलाषा’’ जैसी कविताओं में तत्कालीन समाज के लिए स्वतंत्रता की भावना को जगाया। सुमित्रानंदन पंत जी ने ‘’मातृभूमि’’, भारत-माता आदि कविताओं में मातृभूमि की गरिमा, उसकी रक्षा की आवश्यकता को समझाकर देशभक्ति भावना को उजागर करते हुए अपनी मातृभूमि के लिए नतमस्तक होने का मार्ग दिखाया। इसी प्रकार सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, अज्ञेय आदि की कविताओं का अनुसंधान करने से तत्कालीन समस्याओं और निदान के राह दिखायी पड़ते हैं। हिन्दी साहित्य में प्रमुख कवियों की रचनाओं पर दृष्टि डालने से उनमें वर्णित तत्कालीन समस्याओं का परिचय मिलता है।

               आज कोविड-19 महामारी से सारा विश्व पीड़ित है। यह कोई नई बात नहीं है। इस महामारी से मानव जाति का संरक्षण करना है तो प्राचीन हिन्दी कविताओं का अनुसंधान करना बहुत ही आवश्यक है। आधुनिक कवि नागार्जुन के द्वारा लिखा गया ‘’अकाल और उसके बाद’’ कविता में उन्होंने अकाल के समय का जो वर्णन किया आज भी यही स्थिति है।

कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास

कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास

कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त

कई दिनों तक चूहों को भी हालत रही शिकस्त।।

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद

धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद

चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद

कौए ने खुजलाई पंखें कई दिनों के बाद ।।

                कोविड-19 महामारी के कारण लॉकडाउन का प्रभाव आम आदमी पर बहुत ज्यादा था। पूरे विश्व में सन्नाटा छा गया है। सड़कों के किनारे रहनेवाले, मजदूर, भिखमंगे, रोजगार से जीवन बितानेवाले आदि की स्थिति बहुत दयनीय बन गई है। सड़कों पर घूमनेवाले गाय, कुत्ते आदि को खाना नहीं मिल रहा है। महामारी से देश को बचाने की ओर अनुसंधान करने की आवश्यकता है। साहित्य पठन-पाठन मानव में आत्मनिर्भरता की भावना को भरती है। उदाहरण के लिए हरिवंश राय बच्चन जी की ‘’कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती’’ कविता-

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,

क्या कमी रह गयी, देखो और सुधार करो,

जब तक न सफल हो, नींद चैन से त्यागो तुम।

कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती,

कोशिश करनेवालों की हार नहीं होती।

                              इससे प्रेरणा पाकर अनुसंधान मार्ग में आगे बढ़ते हुए सभी भारतवासियों को आत्मनिर्भर होने की आवश्यकता है।

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