TEJASVI ASTITVA
MULTI-LINGUAL MULTI-DISCIPLINARY RESEARCH JOURNAL
ISSN NO. 2581-9070 ONLINE

संपादकीय – फ़रवरी 2017

मानव मूल्य एवं मानव अधिकारों की बात आज हर व्यक्ति करता तो है, पर वास्तव में आज इन्सान की क्या कीमत रह गयी है और मानव अधिकार किस हद तक जरूरतमंदों तक पहुँचता है, इस का आंकलन शायद अब तक किसी ने न किया। मैंने अपने इक्कीस दिन के आंध्रप्रदेश के दौरे में जो देखा और महसूस किया उससे मन में ये जानने की जिज्ञासा हुई कि आज इन्सान की कीमत इस राज्य में क्या रह गयी है। इसी प्रकार दिल्ली जो देश की राजधानी है वहाँ भी हमने मानव अधिकार के उल्लंघन एवं हनन के मामलों की सर्वेक्षण की। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड जैसे राज्यों में भी इसकी सर्वेक्षण कर एक तुलनात्मक अध्ययन करने की कोशिश की। मकसद एक था, मानव मूल्य यानी इन्सान की कीमत का आंकलन कर इस सत्य का पता लगाना कि आज आम मानव को किस हद तक उसके अधिकार प्राप्त हो रहें यानी क्या उसे न्यायोचित न्याय मिल पा रहा?

जो हम ने देखा उस जमीनी सच्चाई को बयां करते हुए ऐसा लगता हेै कि हम एक मिथ्या विकास की दुनिया में जी रहे हैं। वास्तव में अधिकांश मानव की कोई कीमत हेै ही नहीं। वे महज़ कीड़े मकोड़ों की तरह अपनी जिंदगी व्यतीत कर रहे हैं। उन्हें अपनी उन्नति और देश के विकास के विषय में सोचने कि न तो फुरसत है और न ही कभी इच्छा होती है। उन्नति और विकास का तो जैसे मन में उनके ख्याल ही नहीं आता। महज़ अपने और परिवार का पेट और उसके भरण-पोषण के विषय में ही सोचते सोचते जीवन व्यतीत हो जाता है। ऐसा पाया गया कि इसी तर्ज पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी पूरी ज़िन्दगी अपने और अपने परिवार के इर्द-गिर्द ही बिता देते हैं। पेट के आगे उन्हें कुछ नहीं सूझता। तो कैसे अपने शिक्षा के विषय में सोचेंगे।

इस सत्य से इन्कार करना संभव नहीं कि जब तक शिक्षा नहीं होगी तब तक देश में लोगों की न तो उन्नति होगी और न ही देश का वास्तविक विकास। हम चाहे जितना मर्जी अच्छी सड़कें बना लें, फ्लाई ओवर बना लें, मेट्रो या मोनो रेल चला लें, अथवा लम्बी लम्बी विदेशी गाड़ियों में घूम लें, परन्तु देश का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब देश का हर बच्चा, स़्त्री, पुरूष, शिक्षित हो जाएं। वरना सब ढकोसला है। केवल कुछ चुनिन्दा लोगों के लिए है। परंतु जब हम देश के विकास की बात करते हैं तो उस विकास में शामिल होता है देश के हर नागरिक का विकास, पशु-पक्षियों का विकास, खास तौर पर कृषि का विकास, स्वास्थ्य सेवा का विकास, परिवहन व्यवस्था, आर्थिक व्यवस्था यानी जब सब का विकास होगा, तभी देश का सर्वाण्गीण विकास होगा और तब ही हम वास्तव में विकसित देश कहलाएंगे।

परन्तु क्या आज ऐसा हो रहा? क्या सभी बच्चों को उचित, अच्छी गुणवŸाा युक्त, एवं उत्पादकता युक्त शिक्षा दी जा रही है। देश में आज भी सभी राज्यों में वहाँ की प्रान्तीय भाषा का प्रचलन पूरे शबाब पर है। परन्तु देश के सभी लोग सभी प्रान्तीय भाषा के जानकार नहीं होते है। लिहाज़ा, एक दूसरे प्रान्त से परस्पर संबंध, संचार, संवाद, ज्ञान का आदान-प्रदान एवं एक प्रान्त में बनी वस्तुओं का दूसरे प्रान्त से व्यापार एवं वाणिज्य पूरी तरह से संभव हो ही नहीं सकता। हाँ, छुट-पुट व्यापार एवं वाणिज्य यदि हो भी रहा हो, तो वो भी एक सामान्य भाषा के माध्यम से ही संभव है जो कि आज देश में हिन्दी के नाम से जानी जाती है। बिना हिन्दी के ज्ञान के एक दूसरे से संबन्ध स्थापित करना व्यापार एवं वाणिज्य करना या शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ना संभव ही नहीं है। लिहाज़ा, हिन्दी की शिक्षा सब के लिए नितांत आवश्यक है और इसे सरकार द्वारा अनिवार्य घोषित कर देना भी नितान्त आवश्यक है। परन्तु ऐसा नहीं है। किसी भी राज्य में हिन्दी की शिक्षा अनिवार्य नहीं है। केवल नाम मात्र को हिन्दी की पढ़ाई हो रही है। हिन्दी को पिछड़ा बनाया जा रहा है। जब कि हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जो पूरे राष्ट्र में सामान्य रूप से सभी लोगों द्वारा अपनायी और बोली जाती है। अहम् बात तो ये है कि सभी को हिन्दी की जानकारी एवं शिक्षा के बगैर राष्ट्र का विकास संभव ही नहीं है।

हालाँकि, भारत सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा सभी पहलुओं पर गहन अध्ययन कर विभिन्न प्रकार की योजनाएं एव कार्यक्रम घोषित किया गया, जो कि अधिकांश जनता के हित में, उसकी शिक्षा के हित में, उसके स्वास्थ्य के हित में, उसके रोजगार के हित में यानी उसके सर्वाण्गीण विकास के हित में थी। परन्तु, मैं ने ऐसा पाया, अधिकांश स्थानों पर अधिकांश लेागों का विकास केवल मात्र इस कारण से न हो सका क्योंकि वहाँ पर उचित शिक्षा, उचित स्वास्थ्य, उचित व्यापार, उचित संचार, उचित संवाद, उचित ज्ञान के आदान-प्रदान की कोई भी समुचित व्यवस्था नहीं है। बावजूद इसके कि सरकार के कार्यक्रम इस दिशा में कार्यरत हैं। मसलन, गरीब विधवाओं एवं बुजुर्गों को पेन्शन की एक राशि दिया जाना, गाँवों में सभी बच्चों को शिक्षा दिया जाना, महिलाओं को उनके अधिकार की सुरक्षा प्रदान करना, युवाओं को रोजगार देना आदि सरकार के कुछ कार्यक्रम निश्चित् रूप से चल तो अवश्य रहे हैं, परन्तु मेरे ख्याल से और जैसा कि आप को भी ये जानकारी होगी कि ये सभी लाभ किसी भी लाभार्थी तक तब तक नहीं पहुँचता, जब तक उसके हाथ किसी रसूखवाले व्यक्ति की सिफारिशी पत्र अथवा फोन न हो। यानी आम लोगों तक कोई भी लाभ किसी भी स्तर पर नहीं पहँुचता। शिक्षा से संबंधित “सर्वशिक्षा अभियान”, रोजगार के लिए ”मनरेगा“, शहर एवं गाँवों की सफाई केलिए स्वच्छ भारत, गाँवों में शोैच के लिए ”शौचालयांे का निर्माण“, परिवहन के लिए सड़कों की दुरूस्ति-ग्राम सड़क योजना इत्यादि कुछ ऐसी योजनाएँ जो सुनने में और अधिकांश लोगों के हित में अत्यंत लाभकारी एवं अच्छा प्रतीत होता हेै, परंतु जमीनी सच्चाई क्या है, ये मैंने देख लिया और आप भी भली भंाति जानते होेेंगे। सब के सब लगभग शून्य, अधिकांश क्षेत्रों से नदारद।

मेरी नज़र में उपरोक्त सारे तथ्य मानव अधिकारों के उल्लंघन के सिवा और कुछ नहीं। बुजुर्ग एवं विधवा महिलाओं द्वारा बार-बार सरकारी दफ्तरों में चक्कर काटना, इलाज केलिए धक्के खाना, बच्चों के स्कूल मेें दाखिले केलिए हाथ पसारना, रोजगार केलिए भीख माँगना, मेरी नज़र में ये सब और कुछ नहीं महज़ मानव अधिकारों के हनन का नंगा नाच है। इन अधिकारों की बहाली (Restitution and Restoration of Human Rights) केे लिए ”तेजस्वी अस्तित्व“ संस्था निरंतर प्रयासरत एवं कार्यरत है। हमारी कोशिश है कि उपरोक्त वर्णित कमियों को सरकार द्वारा दुरूस्त कराकर सभी कार्यक्रमों को सुचारू रूप से चलाने की व्यवस्था करा सकॅू। परंतु इसकेलिए सब से महत्वपूर्ण है कि भारत के सभी निम्न एवं मध्य वर्ग के लोगों को अपने मूलभूत एवं संवैधानिक मानव अधिकारों के विषय में संपूर्ण जानकारी हो। जो कहीं नहीं हैं। इसी कारण ये संस्था गाँवोें, स्कूलों, काॅलेजों, शिक्षकों एवं शिक्षाविदों के साथ जुड़कर एक संवादगोष्ठी का आयोजन करने जा रही है, जिससे भारत के सभी लेागों के मानव अधिकारों के विषय में समुचित जानकारी हा सकेगीे और किसी का, किसी के द्वारा किसी भी स्थान पर शोषण न हों। मेरा मानना है कि किसी का कोई भी शोषण करता नहीं, बल्कि मानव अधिकारों के जानकारी के अभाव में हम खुद अपना शोषण करवाते हैं। इसलिए भी जागरूकता के मद्देनज़र ये संगोष्ठी अत्यंत महत्वपूण एवं आवश्यक हो जाती है और मेरे ख्याल से इस संगोष्ठी में भारत के सभी राज्यों के पुलिस, महानिदेशक, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के निदेशक, केंद्रीय सतर्कता आयोग के अध्यक्ष एवं सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को इस संगोष्ठी में भाग लेना नितान्त आवश्यक बनता है जिससे उपरोक्त कर्मियों का उनको बोध हो सके और वे इसकी दुरूस्ती की ओर कदम उठा सकें।

 

डी.एन्.श्रीवास्तवा

एडिटर इन चीफ

78 Responses to संपादकीय – फ़रवरी 2017

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