TEJASVI ASTITVA
MULTI-LINGUAL MULTI-DISCIPLINARY RESEARCH JOURNAL
ISSN NO. 2581-9070 ONLINE

मृदुला गर्ग और उषा प्रियंवदा के उपन्यासों में नारी के परिवर्तित जीवन मूल्य

ई. रवि कुमार,

शोधार्थी, हिन्दी विभाग,

आन्ध्र विश्वविद्यालय, विशाखपट्टणम-03, दूरभाषः-9985852292,

E-mail: [email protected]

 

इक्कीसवीं सदी के उपन्यासकार के उपन्यास का कथ्य जीवन के अधिक नजदीक है, उसमें यथार्थ का पुट अधिक है। मानवीय संबंधों के बदलते रूप को उसमें उजगरा करने का प्रयास हुआ है। मन के भीतर की परतों को उधेड़ने का प्रयास भी इन उपन्यासों में हुआ है। आधुनिकता बोध से उत्पन्न अकेलेपन, अजनबीयत, यौन- विसंगतियाँ, विद्रोह, कुंठा एवं मूल्यों का ह्रास आज के उपन्यासों के विषय है। आज नए मूल्य तलाशने का प्रयास किया जा रहा है और नैतिकता के प्राचीन मानदंडों की अवहेलना हो रही है। स्वाधीनता के बाद समाज के मूल्य बदलते रहे इन परिवर्तित मूल्यों के इक्कीसवीं सदी के कई उपन्यासों में दर्शन हुए इक्कीसवीं सदी में स्त्री लेखन नई ऊर्जा के साथ उभरा, स्त्री लेखन की लहर चल पड़ी है। यह ऊर्जा प्रभाव प्राचीन नारी की ऊर्जा से आया है। यह तथ्य झोठलाया नहीं जा सकता। इससे नारी के विचारों में एवं बर्ताव में परिवर्तन आया है। वर्तमान में जीवन मूल्यों को प्रतिपादित करनेवाला साहित्य प्रासंगिक होता है।

मृदुला गर्ग का 2005 में प्रकाशित ‘मिलजुल’ उपन्यास नारी के स्वातंत्र अस्तित्व की खोज को प्रस्तुत करनेवाला उपन्यास है। जिसमें रूढ़ि एवं परंपराओं में जकड़ी नारी की अंतर्ग्रंथी को सुलझाया है। शादी के दस साल बाद गुलमोहर अपनी पूरी वास्तविकता के साथ उतारती है। इस उपन्यासों में गुलमोहर और मोगरा दोनों बहनें हैं। दोनों के रूप एवं स्वभाव में काफी भेद है। मोगरा दिखने में गुल से काफी सुंदर है। पढ़ाई में अच्छी है, स्वभाव भी ऐसा मानो सबके साथ सब की तरह एडजेस्ट करनेवाली नाट्याभिनय में अत्यंत प्रवीण। दिखने में आकर्षक एवं अत्यंत मर्यादाशील। इस के बिल्कुल अलग गुल का स्वभाव होता है। मोगरा और गुलमोहर दोनों बहाने हैं, दोनों का दुःख और जीवनयापन करने का ढंग बिल्कुल एक जैसा है। अपने परिवार के लिए अपने आप को समेटना बिल्कुल एक जैसा है। दोनों भी पढ़ी – लिखी हैं। स्वतंत्र विचारों की हैं किंतु पति के होते हुए भी वह परिवार का बोझ खुद अकेली ढोती है और पति महाशय है कि नहीं के बराबर होकर भी उनका अपने परिवार के लिए कोई फायदा नहीं। पत्नी उन दोनों के लिए एक जीवन का माध्यम मात्र है और कुछ नहीं।

एक जुलमोहर जो भोगा हुआ यथार्थ दस साल बाद लिखती है। दोनों की नजरों में पुरुष प्रतिमा स्वार्थी है। दोनों अलग किस्म की जिंदगी जीना चाहती है। उनके हिस्से में अलग जिंदगी आती है। दोनों पति की नजरों में  पत्नी केवल मात्र भोग का एक साधना है और कुछ नहीं। गुलमोहर का मानना है, नारी के मन में अदब है, फन है। उसे उनसे कैसे मुक्ति मिलेगी तो मोगरा का विचार होता है। हमें औरत के रूप में अदब और फन को मानक मानकर रहना चाहिए। संक्षेप में मोगरा और गुलमोहर का जीवन की ओर देखने का दृष्टिकोण अलग होता है किंतु जिंदगी उस ढंग से जीती है। जिस जिंदगी की उन्हें कभी चाह न थी। अक्सर समाज में नारी को निम्न, मध्य, उच्च वर्ग हो अपना जीवन एडजेस्ट करके ही जीना पड़ता है। यह दोनों भी नारिपात्र बिल्कुल वैसे ही हैं।

उषा प्रयंवदा का 2005 में प्रकाशित ‘अंतर्वषी’ उपन्यास में भी यही बताया गया है। अक्सर लोग विदेश में रहने वाला दामाद पाना बड़प्पन की बात मानते हैं। बिना सोचे समझे लड़के की जानकारी लिए बिना होनेवाला दामाद से अपनी लड़की की शादी करा देता हैं। कुछ और काम करता है। अगर कुछ और काम करता है तो फिर वह अच्छा काम करता है, अगर कुछ और काम करता है तो फिर वह अच्छा काम करता है, या बुरा। इस प्रकार किस भी बात की जानकारी नहीं ली जाती है। ऐसे लोगों के पल्ले तब किसी की लड़की है तो उसका असर क्या होता है ? जो भी होता है अंजाम लड़की को ही भुगतान पड़ता है। श्वेष मिश्र भारतीय है। अमरीका में पीएच. डी. कर रहा है और पढ़ाई के साथ नौकरी भी करता है यह बताकर वनश्री उन्हें दी जाती है। वह ब्याह भी कुछ इस प्रकार होता है। शादी से पहले जो लड़का दिखाया जाता है वह श्वेष का मित्र राहुल होता है। वह श्वेष से अच्छे खासा और भारतीय परंपरा एवं सभ्यता को माननेवाला होता है। वनश्री की बुआ तथा पिता के चरण छू कर वह उन्हें यह बात पूरी तरह से दिखने की कोशिश करता है कि अपनी संस्कृति और संस्कारों की पूरी तरह का धोखा होता है शादी से पहले लड़के के रूप में राहुल को दिखाया जाता है और शादी श्वेष के साथ करा दी जाती है।

अत्यंत स्वाभिमानी एवं स्वतंत्र विचारोंवाली वनश्री अंत में राहुल को दूसरे पति के रूप में स्वीकारती है वह भी श्वेष को बताकर। अर्थात श्वेष इस बात के लिए राजी नहीं होता फिर भी पहले से ही धोखा देता हुआ आया श्वेष जिसको वह त्याग देती है और राहुल को जीवनसाथी के रूप में स्वीकारती है। इस प्रकार ‘अंतर्वषी’ उपन्यास में लिखिका ने यह बात बताया है वनश्री अंत में अपने मन की ही मानती है। इक्कीसवीं उपन्यासों में नारी के जीवन मूल्य गुलमोहर, मोगरा, वनश्री में यही नजर आते हैं कि वह शिक्षित है। अपने पति की सहायता करती है परिवार में न मिलने पर आर्थिक स्तर पर पहले स्वावलंबी होती हैं और परिवार की सारी जिम्मेदारियाँ खुद अपने कंधे पर ले लेती हैं। तीनों के भी पति गलत राह पर चलने वाले, नकारे हुए और वास्तव में बेकार है। ये तीनों नारी पात्र रोती नहीं अपने आप को कोसती नहीं या मैकेवालों की सहायता नहीं लेती, बल्कि हालत का खुद सामना करती है और उस स्थिति से बाहर आ जाती है यह तीनों नारी पात्र स्वतंत्र विचारवाले हैं। यही वजह है वनश्री अंत में भी अपने मन की, आत्मा की बात मानती है और राहुल से शादी करके अपना जीवन सुधारती है।

मृदुला गर्ग, उषा प्रयंवदा इन दोनों लेखिकाओं ने ‘अंतर्वषी’ और ‘मिलजुल’ इन दोनों उपन्यासों में स्त्री को परिभाषित करनेवाले इमेज को स्वतंत्र रूप से चित्रित किया है। अगर नारी चाहे तो ही वह अपने जीवन में स्वतंत्रता प्राप्त कर सकती है। इसीलिए तो वनश्री अपने मन की बांसुरी को सुनती है। यही परिवर्तन है बदले हुए परिस्थिति में नारी का स्वयं निर्णय लेना। स्वतंत्र विचार रखना, विचारों को व्यक्त करना। जैसे कि मोगरा अपने सास- ससुर के सामने व्यक्त करती है। अपने पति पर पूरी तरह से निर्भर न रहना। यह भी आज के नारी का परिवर्तित जीवन मूल्य है। अगर माता- पिता द्वारा लड़के का चुनाव गलत हुआ। तो लड़की खुद चुनाव कर सकती है। अपने भोगे हुए यथार्थ को दस साल बाद समाज के सामने यथार्थता के साथ रखना यह भी परिवर्तन ही है। समाज में विद्यमान रूढ़ि एवं परंपरा को, असंस्कारों के अंतर्ग्रंथियों को सुलझाने का प्रयास किया है। दोनों उपन्यास नारी अस्तित्व के हैं।  इक्कीसवीं सदी के नारी में आजादी, स्वाभिमान, विचारों को अभिव्यक्ति देने की स्वतंत्रता, नौकरी करना, आत्मनिर्भर, रूढ़ि एवं परंपराओं को नकारना आदि साहस आया है और यही उनके परिवर्तित जीवन मूल्य है। फिर वह नागरी परिवेश में हो या शहरी परिवेश में।

संदर्भ ग्रंथः-

  1. ‘मूलजुल’रू मृदुला गर्ग’, प्रकाशन वषर्रू 2005
  2. ‘अंतर्वषी’ रू उषा प्रियंवदा , 2005
  3. ‘विवरण पत्रिका’ दृ मार्च 2010
  4. ‘कथाक्रम पत्रिका’ दृ पुष्पपाल सिंह
  5. ‘इक्कीसवीं शती के नारी उपन्यास’

 

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